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जल संरक्षण के लिए पारंपरिक ज्ञान ही कारगर रन सिंह परमार

भोपाल। पानी का संकट मध्यप्रदेश के साथ-साथ पूरे देश और दुनिया में गहराता जा रहा है। बुंदेलखंड में पानी के भयावह संकट के कारण पलायन और सूखे की मार पड़ी है। तालाब, नदियों और बावडि़यों के संरक्षण पर काम करने के बजाय बोरिंग और पाइपलाइन सप्लाई पर ध्यान दिया जा रहा है, जो जल संकट को खतरनाक स्तर तक ले जाएगा। आज भले ही पानी का मुद्दा राजनीतिक नहीं है, पर आने वाले कुछ सालों में ही यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा। एक ओर सरकार पानी का निजीकरण कर रही है, तो दूसरी ओर इसके अनुभव बहुत ही खराब रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि पानी पर समुदाय का अधिकार हो। पानी को सहेजने के लिए पारंपरिक तरीकों को बढ़ावा देने की जरूरत है।

उक्त बातें आज विष्व जल दिवस के उपलक्ष्य में मध्यप्रदेष जलाधिकार अभियान द्वारा गांधी भवन, भोपाल में ‘‘जल: चुनौतियां और समाधान’’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय राज्य सम्मेलन में विभिन्न वक्ताओं ने कही। सम्मेलन में एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रन सिंह परमार ने कहा कि जल हैंडपंप एवं बोरिंग के आने के बाद सतही पानी की निर्भरता कम हो गई और फिर तालाब, नदी व बावड़ी प्रदूषित एवं खराब होने लगे। बुंदेलखंड तालाबों के लिए जाना जाता था, पर अब वहां तालाब गायब हो गए या उनका पानी पीने लायक नहीं है। आज चिंता है कि कैसे पानी का संरक्षण और संवर्द्धन कैसे करें? इस पर समाज को जागरूक करने की जरूरत है। भूमिगत जल के असीमित दोहन को रोकने, तालाबों, नदियों एवं झीलों के उपयोग को बढ़ावा देने, वर्षा जल का संग्रहण एवं संरक्षण करने, छोटे-छोटे बांध का निर्माण करने सहित कई उपाय करने होंगे।

पानी पर कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता गौरव ने पानी के निजीकरण के मुद्दे और उससे समुदाय पर पड़ने वाले प्रभाव एवं गहराते जल संकट पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पानी का अधिकार संविधान में तो नहीं है, पर कुछ कोर्ट के फैसले हैं, जिनमें उन्होंने जीने के अधिकार के साथ पानी को जोड़कर देखा है। पानी का निजीकरण होने से कंपनियां मुनाफे के लिए पानी बेचेंगी और समुदाय के एक बड़े तबके से पानी छिन जाएगा। जल जन जोड़ो अभियान के भगवान सिंह ने कहा कि स्थानीय लोगों को जोड़कर जल संरक्षण पर काम करने की जरूरत है। गांधी आश्रम, छतरपुर के संजय सिंह ने बताया कि बुंदेलखंड के तालाब गायब हो गए हैं, अब नदियां खतरे में हैं। वाटर पोर्टल, दिल्ली के संपादक सिराज केसर ने महोबा एवं बांदा में अपना तालाब अभियान के अनुभवों को साझा किया और कहा कि समुदाय को आगे करके ही जल संरक्षण पर जोर देना होगा। ऐसी पहलों को सरकार बड़े स्तर तक ले जा सकती है। वाटर एड के अमर ने कहा कि विमर्श की बातों को सहज भाषा में आम जन तक ले जाने और सुझावों को सरकार से साझा करने की जरूरत है।

जल अधिकार अभियान के अनिल गुप्ता ने संचालन करते हुए कहा कि हर साल जल संकट पहले की तुलना में ज्यादा गहरा होता जा रहा है, ऐसे में हमें दीर्घकालिक रणनीति बनाने की जरूरत है। एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक अनीष कुमार ने कहा कि इस मुद्दे से युवाओं एवं बच्चों को जोड़ने की जरूरत है, ताकि भावी पीढ़ी पर संकट न आए। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश तिवारी ने कहा कि जल संरक्षण के लिए हमें पारंपरिक ज्ञान पर जोर देना होगा। सत्यप्रकाश आर्य ने कहा कि सरकार तक बात ले जाने के लिए हमें शोध एवं विकल्प तैयार करना होगा। सम्मेलन में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सौमित्र, चंद्रहास, श्रद्धा कश्यप, मनीष कुमार, जितेन्द्र परमार ने भी अपनी बातें रखी।

 
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